बागेश्वर जिला गठन के 29 साल पूरे हो गए। प्रशासनिक सुविधाओं का विस्तार हुआ, लेकिन स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, उद्योग और दूरस्थ क्षेत्रों के विकास की चुनौतियां अब भी कायम हैं।
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बागेश्वर जिला बने 29 साल: दफ्तर खुले, प्रशासन पहुंचा करीब, लेकिन कई सवाल अब भी जस के तस
जिला बना, दफ्तर खुले...लेकिन कई सवाल जस के तस, 29 साल बाद भी बागेश्वर की कसक
सरयू और गोमती के पवित्र संगम पर बसे बागेश्वर जिले के गठन को आज 29 वर्ष पूरे हो गए हैं। 15 सितंबर 1997 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले से अलग कर प्रदेश का 12वां जिला घोषित किया था। अलग जिले के रूप में अस्तित्व में आने के पीछे वर्षों का जनसंघर्ष और स्थानीय लोगों की लंबी मांग रही। जिला बनने के बाद प्रशासनिक सुविधाओं का विस्तार तो हुआ, लेकिन तीन दशक की ओर बढ़ चुके सफर में विकास की कई उम्मीदें आज भी पूरी होने का इंतजार कर रही हैं।
तीन तहसीलों से शुरू हुआ था बागेश्वर जिले का सफर
शुरुआत में बागेश्वर, कपकोट और गरुड़ तहसीलों को मिलाकर जिले का स्वरूप तैयार किया गया। बाद में कांडा, शामा और दुगनाकुरी समेत नई प्रशासनिक इकाइयां अस्तित्व में आईं। जिला बनने से पहले दुर्गम क्षेत्रों के ग्रामीणों को छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए अल्मोड़ा की लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। इसी समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग, छात्र संगठनों और जनसंगठनों ने जिला बनाने की मांग को लेकर लंबा आंदोलन चलाया।
जेल यात्रा और आमरण अनशन से मिला जिले का दर्जा
बागेश्वर जिला बनाने के आंदोलन में स्वर्गीय गुसाईं सिंह दफौटी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिला बनाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में उन्होंने आंदोलन को धार दी। उनकी पत्नी नीमा दफौटी के अनुसार, आंदोलन के दौरान गुसाईं सिंह दफौटी ने करीब सात महीने सेंट्रल जेल में बिताए और 1994-95 के दौरान नौ से 10 दिन तक आमरण अनशन भी किया। परिवार ने आंदोलन के दौरान पुलिस की प्रताड़ना भी झेली।
वहीं, तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष अल्मोड़ा जोहार सिंह परिहार ने बसपा की ऐतिहासिक रैली में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के समक्ष बागेश्वर को जिला और कपकोट को तहसील बनाने की मांग रखी थी। आंदोलन और राजनीतिक दबाव के बीच आखिरकार 15 सितंबर 1997 को बागेश्वर को जिले का दर्जा मिला।
29 साल में बढ़ी प्रशासनिक पहुंच
जिला बनने के बाद बागेश्वर में प्रशासनिक ढांचे का विस्तार हुआ। कलेक्ट्रेट, विकास भवन, जिला अस्पताल, डिग्री कॉलेज और पुलिस लाइन जैसी संस्थाएं स्थापित हुईं। सड़क नेटवर्क का भी दूरस्थ गांवों तक विस्तार हुआ। मेलाडुंगरी हेलीपैड से हल्द्वानी और दिल्ली के लिए हेली सेवा शुरू होने से लोगों के आवागमन का समय कम हुआ है।
प्रशासनिक स्तर पर कपकोट और गरुड़ नगर पंचायत अस्तित्व में आए, शामा उप-तहसील बनी तथा दुगनाकुरी और काफलीगैर तहसीलों का गठन हुआ। इसके बावजूद कांडा ब्लॉक के गठन की मांग अब भी क्षेत्रीय जनता के संघर्ष का विषय बनी हुई है।
अस्पताल से लेकर रोजगार तक चुनौतियां बरकरार
जिला बनने के 29 वर्ष बाद भी बागेश्वर पूर्ण आधारभूत ढांचे के लिए संघर्ष कर रहा है। जल संस्थान, एआरटीओ, सेवायोजन, श्रम विभाग और वन निगम जैसे कई विभाग अब भी किराये के भवनों में संचालित हो रहे हैं। जिला अस्पताल के लिए अलग भवन का निर्माण नहीं हो सका है और अस्पताल सीएचसी के भवन में संचालित हो रहा है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लोगों की परेशानी बनी हुई है।
युवाओं के लिए जिले में अब तक अपना खेल स्टेडियम नहीं बन सका है। रोडवेज डिपो बनने के बावजूद कार्यशाला का निर्माण पूरा न होने से डिपो का पूर्ण संचालन भी प्रभावित है। बदियाकोट, कुवांरी, बोरबलड़ा और दाबूं हड़ाप जैसे सीमांत क्षेत्रों में ग्रामीण आज भी सड़क, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
पुल, सड़क और डंपिंग जोन भी बड़ी चुनौती
जिला मुख्यालय में सरयू पुल पर भारी वाहनों की आवाजाही और हाइट गेज का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। शहर की खस्ताहाल सड़कें, डंपिंग जोन का अभाव और वर्ष 1913 में बने पुराने पुलों के स्थान पर नए स्टील ढांचे के निर्माण की धीमी रफ्तार भी लोगों की चिंता का विषय है।
उद्योग और रोजगार के मोर्चे पर भी तस्वीर चिंताजनक
उद्योग के मोर्चे पर भी जिले की तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। उद्योगपति दलीप सिंह खेतवाल के अनुसार, 29 वर्षों में ऐसा कोई बड़ा उद्योग स्थापित नहीं हो सका, जहां 20 से अधिक लोगों को नियमित रोजगार मिल सके। मैग्नेसाइट फैक्टरी भी घाटे की मार झेल रही है। उनका कहना है कि तीन दशक पहले सड़क और रोजगार के लिए जो संघर्ष था, उसकी कई तस्वीरें आज भी बदली नहीं हैं।
आंदोलनकारियों की कसक अब भी बरकरार
राज्य आंदोलनकारी और कृषक रमेश पांडेय का कहना है कि प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा तो खड़ा हो गया, लेकिन जनपक्ष से जुड़े कई मुद्दे आज भी वहीं हैं, जहां से आंदोलन शुरू हुआ था। खासकर दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की समस्याओं में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।
वहीं प्रभारी जिलाधिकारी एवं एडीएम एनएस नबियाल के अनुसार, जिला बनने के बाद बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में प्रगति हुई है। सीमांत क्षेत्रों तक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य से जुड़ी कमियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने के लिए शासन स्तर पर पैरवी की जा रही है।
29 साल बाद भी विकास की अगली चुनौती
29 वर्षों का सफर बागेश्वर के लिए उपलब्धियों और अधूरी उम्मीदों, दोनों की कहानी कहता है। जिला बनने से प्रशासन लोगों के करीब जरूर आया, लेकिन अब अगली चुनौती उस विकास को दूरस्थ गांवों की चौखट तक पहुंचाने की है, जिसके लिए बागेश्वर के लोगों ने दशकों पहले संघर्ष शुरू किया था।
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