100 वर्षीय ‘दादी माँ’ के निधन पर संचालिका शशि सिंह ने खुद उठाई अर्थी, मूसलाधार बारिश में दी अंतिम विदाई
खून का रिश्ता नहीं, फिर भी निभाया औलाद का फर्ज
स्थान:- हल्द्वानी
हल्द्वानी: इंसानियत और मानवीय रिश्तों की मिसाल पेश करने वाली एक भावुक घटना तिकोनिया स्थित विरासत वृद्धाश्रम में देखने को मिली। हेल्पिंग हैंड चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित इस वृद्धाश्रम में लंबे समय से रह रहीं 100 वर्षीय निराश्रित बुजुर्ग महिला, जिन्हें आश्रम में सभी लोग प्यार से ‘दादी माँ’ कहते थे, का रविवार सुबह निधन हो गया। उनके निधन से पूरे आश्रम परिवार में शोक की लहर दौड़ गई।
संचालिका ने निभाया बेटी का फर्ज
दादी माँ के अंतिम समय में उनका कोई जैविक परिजन मौजूद नहीं था। ऐसे में आश्रम की संचालिका शशि सिंह ने बेटी का फर्ज निभाते हुए उनके अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने स्वयं दादी माँ की अर्थी को कंधा दिया और अंतिम यात्रा में शामिल होकर उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
आश्रम से जुड़े लोगों के अनुसार, 100 वर्ष की उम्र के बावजूद दादी माँ का व्यवहार बेहद स्नेहपूर्ण था। वह आश्रम में रहने वाले अन्य बुजुर्गों और सदस्यों के बीच अपनेपन और दुलार का केंद्र थीं। संचालिका शशि सिंह भी उनकी देखभाल अपनी सगी दादी की तरह करती थीं। उनके निधन के बाद आश्रम में मौजूद हर व्यक्ति भावुक नजर आया।
पूरे विधि-विधान से कराया अंतिम संस्कार
शशि सिंह ने दादी माँ के अंतिम संस्कार की सभी व्यवस्थाएं कीं और पूरे धार्मिक रीति-रिवाज के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का गर्व है कि ईश्वर ने उन्हें दादी माँ का अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान और सम्मान के साथ करने का अवसर दिया।
शशि सिंह के मुताबिक, भले ही दादी माँ का कोई जैविक परिवार उनके साथ नहीं था, लेकिन विरासत वृद्धाश्रम ही उनका परिवार था। उन्होंने अंतिम यात्रा में साथ देने वाले आश्रम के सदस्यों और स्थानीय लोगों का आभार जताया।
मूसलाधार बारिश में दी अंतिम विदाई
दादी माँ की अंतिम यात्रा के दौरान क्षेत्र में मूसलाधार बारिश हो रही थी। इसके बावजूद आश्रम के सदस्य और स्थानीय लोग अंतिम विदाई देने के लिए डटे रहे। भारी बारिश के बीच नम आंखों से दादी माँ की अंतिम यात्रा निकाली गई और उन्हें अंतिम विदाई दी गई।
इंसानियत के रिश्ते की मार्मिक मिसाल
यह घटना समाज के सामने इंसानियत और मानवीय संवेदनाओं की एक मार्मिक तस्वीर पेश करती है। जहां खून के रिश्ते साथ न हों, वहां भी सच्चे अपनत्व, सेवा और स्नेह से बने रिश्ते किसी परिवार से कम नहीं होते। दादी माँ को अंतिम समय में भले ही कोई जैविक परिजन न मिला हो, लेकिन आश्रम के लोगों ने उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानकर पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी।