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लखनऊ में बड़ा खुलासा: ₹8.87 करोड़ की फर्जी बिलिंग, 39 लाख टैबलेट का हिसाब गायब
Lucknow News: नकली दवाओं के नेटवर्क का बड़ा खुलासा, ₹8.87 करोड़ की फर्जी बिलिंग; 39 लाख टैबलेट का हिसाब गायब
lucknow fake medicine case: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दवाओं की खरीद-बिक्री और सप्लाई चेन से जुड़ी जांच में करोड़ों रुपये की कथित फर्जी बिलिंग और बड़ी संख्या में टैबलेट के रिकॉर्ड में गड़बड़ी सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक करीब ₹8.87 करोड़ की फर्जी बिलिंग और लगभग 39 लाख टैबलेट के हिसाब में अनियमितता का मामला सामने आया है। मामले में दवा कारोबार से जुड़े लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की पड़ताल कर रही हैं।
यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की नकली और संदिग्ध दवाओं के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच सामने आई है। इससे पहले भी लखनऊ में फर्जी बिलिंग, क्रॉस-बिलिंग और कागजी लेन-देन के जरिए संदिग्ध दवाओं की सप्लाई की जांच सामने आ चुकी है।
₹8.87 करोड़ की फर्जी बिलिंग से जांच एजेंसियां भी हैरान
जांच में करीब ₹8.87 करोड़ की कथित फर्जी बिलिंग का पता चला है। अधिकारियों की जांच में ऐसे लेन-देन और बिलों की जानकारी सामने आई, जिनमें दवाओं की खरीद-बिक्री कागजों पर दिखाई गई, लेकिन वास्तविक स्टॉक और उपलब्ध रिकॉर्ड के बीच अंतर पाया गया।
सबसे अहम सवाल करीब 39 लाख टैबलेट के रिकॉर्ड को लेकर है। इन दवाओं का पूरा हिसाब जांच के दौरान स्पष्ट नहीं हो सका। यही वजह है कि अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कागजों पर दिखाई गई दवाओं की वास्तविक सप्लाई कहां हुई और उनका इस्तेमाल या वितरण किस स्तर पर हुआ।
फर्जी बिलिंग और क्रॉस-बिलिंग का आरोप
जांच में कथित तौर पर फर्जी बिलिंग और क्रॉस-बिलिंग जैसे तरीकों से दवाओं के लेन-देन का रिकॉर्ड तैयार किए जाने की बात सामने आई है।
ऐसे मामलों में कागजों पर दवाओं की खरीद और बिक्री दिखाई जा सकती है, जबकि वास्तविक स्टॉक या सप्लाई रिकॉर्ड उससे मेल नहीं खाता। यही अंतर जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बना है।
उत्तर प्रदेश में नकली दवाओं के खिलाफ चल रही कार्रवाई में FSDA पहले भी फर्जी बिल, कागजी लेन-देन और संदिग्ध सप्लाई नेटवर्क से जुड़े मामलों का खुलासा कर चुका है। जुलाई 2026 में विभाग की कार्रवाई के दौरान लखनऊ में कई दवा फर्मों की जांच और संदिग्ध दवाओं की बरामदगी की रिपोर्ट सामने आई थी।
मरीजों की सुरक्षा को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
दवा की सप्लाई चेन में किसी भी तरह की फर्जी बिलिंग या रिकॉर्ड में हेरफेर केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं है। अगर संदिग्ध या नकली दवाएं वास्तविक सप्लाई चैन में पहुंचती हैं, तो इससे मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
यही कारण है कि दवाओं की खरीद, बिक्री, स्टॉक और वितरण का सही रिकॉर्ड रखना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि रिकॉर्ड में सामने आई गड़बड़ियां केवल कागजी लेन-देन तक सीमित थीं या इनके जरिए संदिग्ध दवाओं को बाजार में पहुंचाने की कोई बड़ी व्यवस्था काम कर रही थी।
लखनऊ में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
लखनऊ और उत्तर प्रदेश में नकली दवाओं के खिलाफ पिछले कुछ समय से कार्रवाई तेज हुई है। FSDA ने जुलाई में कई दवा प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की थी और संदिग्ध दवाओं की बरामदगी के साथ कई फर्मों के खिलाफ एफआईआर की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
एक अन्य मामले में FSDA की जांच के बाद फर्जी इनवॉइस और कथित रूप से हेरफेर किए गए सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड के जरिए दवाओं के लेन-देन की जांच की गई थी।
इससे साफ है कि विभाग केवल बाजार में मौजूद संदिग्ध दवाओं की जांच ही नहीं कर रहा, बल्कि दवाओं की पूरी सप्लाई चेन और बिलिंग रिकॉर्ड को भी खंगाला जा रहा है।
रायबरेली तक पहुंची जांच की आंच
लखनऊ से जुड़े इस मामले की जांच का असर आसपास के जिलों में भी दिखाई दे रहा है। आपकी स्क्रिप्ट के अनुसार, रायबरेली में भी एक मेडिकल एजेंसी की जांच में 32 हजार से अधिक एंटीबायोटिक टैबलेट की खरीद फर्जी बिल के जरिए दिखाए जाने का मामला सामने आया है।
जांच के दौरान संदिग्ध दवाओं के नमूने लिए गए और संबंधित एजेंसी को सील किए जाने की बात कही गई है।
हालांकि, इन विशिष्ट आंकड़ों और कार्रवाई की अंतिम स्थिति को प्रकाशित करने से पहले स्थानीय आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापित करना उचित होगा।
अब जांच के केंद्र में क्या सवाल हैं?
पूरे मामले में जांच एजेंसियों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं।
पहला, कागजों पर दिखाई गई दवाओं की वास्तविक सप्लाई कहां हुई?
दूसरा, करीब 39 लाख टैबलेट के रिकॉर्ड में अंतर क्यों मिला?
तीसरा, फर्जी बिलिंग और क्रॉस-बिलिंग में कितने लोग या फर्में शामिल थीं?
चौथा, क्या इस नेटवर्क का संबंध संदिग्ध या नकली दवाओं की वास्तविक सप्लाई से था?
पांचवां, क्या लखनऊ के अलावा दूसरे जिलों या राज्यों तक भी इसकी कड़ियां जुड़ी हुई हैं?
इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।
दवा कारोबार में रिकॉर्ड की पारदर्शिता क्यों जरूरी?
दवाओं की सप्लाई चेन में निर्माता से लेकर वितरक, थोक विक्रेता, मेडिकल एजेंसी और रिटेलर तक कई स्तर होते हैं। हर चरण पर खरीद और बिक्री का सही रिकॉर्ड होना जरूरी है।
यदि किसी स्तर पर कागजी रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में बड़ा अंतर पाया जाता है, तो वह जांच का विषय बन जाता है।
लखनऊ में सामने आया मामला इसी वजह से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां केवल किसी एक संदिग्ध दवा की बरामदगी का मामला नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर कथित बिलिंग और स्टॉक रिकॉर्ड में अनियमितता की जांच हो रही है।
क्या 39 लाख टैबलेट नकली थीं?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
39 लाख टैबलेट का रिकॉर्ड न मिलना और 39 लाख टैबलेट का नकली होना एक ही बात नहीं है।
जांच में बड़ी संख्या में टैबलेट के रिकॉर्ड में गड़बड़ी सामने आने की रिपोर्ट है, लेकिन सभी टैबलेट नकली थीं, ऐसा निष्कर्ष जांच पूरी होने से पहले निकालना सही नहीं होगा।
दवाओं के नमूनों की जांच, स्टॉक का सत्यापन और सप्लाई चेन की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इनमें कितनी दवाएं संदिग्ध या नकली थीं और कितनी केवल कागजी लेन-देन से संबंधित थीं।
जांच जारी, सामने आ सकती है नेटवर्क की पूरी तस्वीर
फिलहाल जांच एजेंसियां फर्जी बिलिंग, दवाओं के रिकॉर्ड और कथित कागजी लेन-देन से जुड़े लोगों और फर्मों की भूमिका की जांच कर रही हैं।
मामले में एफआईआर दर्ज होना जांच की शुरुआत है। आगे जांच के दौरान नए नाम, फर्म और लेन-देन सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कागजों पर करोड़ों रुपये की दवाएं दिखाई गईं और लाखों टैबलेट के रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली तो वास्तविक सप्लाई कहां हुई?
जांच पूरी होने के बाद ही इस पूरे नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

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