कम बारिश, ज्यादा तीव्रता का खतरा; नैनीताल में बदल रहा मानसून का मिजाज
नैनीताल: बढ़ते तापमान के साथ नैनीताल में मानसून का मिजाज भी बदलता नजर आ रहा है। पिछले वर्षों के बारिश के आंकड़े इस बदलाव की तस्वीर सामने रख रहे हैं। एक दशक पहले नैनीताल में सालाना औसत बारिश करीब 3800 मिलीमीटर के आसपास रहती थी, जो हाल के वर्षों में घटकर करीब 2100 से 2300 मिलीमीटर के बीच रह गई है। बारिश की कुल मात्रा में कमी के साथ इसके वितरण में भी बदलाव देखने को मिल रहा है।
कम अवधि में तेज बारिश की बढ़ सकती हैं घटनाएं
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में लंबे समय तक बारिश नहीं होने और कम अवधि में अत्यधिक बारिश होने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर प्राकृतिक जल स्रोतों और पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों पर पड़ सकता है। पर्याप्त बारिश नहीं होने से जलस्रोतों में पानी का संचयन प्रभावित होता है, जबकि कम समय में तेज बारिश होने से भूस्खलन, जलभराव और मिट्टी के कटाव का खतरा बढ़ जाता है।
पांच साल के आंकड़ों में बारिश का बदलता पैटर्न
नैनीताल में वर्षवार बारिश के आंकड़े भी बारिश के बदलते पैटर्न की ओर संकेत करते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में 1334 मिलीमीटर, 2022 में 1178 मिलीमीटर, 2023 में 1675 मिलीमीटर, 2024 में 1847 मिलीमीटर, 2025 में 2019 मिलीमीटर और 2026 में 2191 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। आंकड़ों में वर्षवार उतार-चढ़ाव लगातार बना हुआ है।
| वर्ष | बारिश |
|---|---|
| 2026 | 2191.00 मिमी |
| 2025 | 2019.00 मिमी |
| 2024 | 1847.00 मिमी |
| 2023 | 1675.00 मिमी |
| 2022 | 1178.00 मिमी |
| 2021 | 1334.00 मिमी |
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सालाना बारिश की मात्रा ही नहीं, बल्कि बारिश का समय और उसका वितरण भी पर्यावरण एवं जल संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण है।
बर्फबारी और जलस्रोतों पर भी पड़ रहा असर
बढ़ते तापमान का असर हिमालयी क्षेत्रों की बर्फबारी और पारंपरिक जलस्रोतों पर भी दिखाई दे रहा है। नैनीताल समेत आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में कई पारंपरिक जलस्रोतों के जलस्तर में कमी दर्ज की गई है। कुछ स्रोतों के सूखने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं, जबकि कई स्रोतों में पहले की तुलना में पानी कम रह गया है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान में वृद्धि का असर वायुमंडलीय और जल चक्र पर पड़ना स्वाभाविक है। इसका प्रभाव मानसून की अवधि, बारिश की तीव्रता और उसके वितरण पर पड़ सकता है।
कम बारिश, लेकिन ज्यादा तीव्रता की आशंका
एरीज नैनीताल के मौसम वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह के अनुसार तापमान बढ़ने के साथ वर्षा के पैटर्न में बदलाव देखा जा रहा है। उनके अनुसार वर्तमान ग्लोबल वार्मिंग की परिस्थितियों में बारिश की कुल मात्रा में कमी के साथ कम समय में अधिक तीव्र बारिश की घटनाओं की संभावना बनी रहती है।
उन्होंने बताया कि वैश्विक तापमान में करीब 1.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि के बीच हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि अधिक महसूस की जा रही है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि का प्रभाव हाइड्रोलॉजिकल साइकल यानी जलचक्र पर भी पड़ता है।
मानसून में पिछले साल से 374.6 मिमी कम बारिश
इस साल मानसून के दौरान जिले में बारिश का वितरण पिछले वर्ष की तुलना में काफी अलग रहा। जून में बारिश कम हुई, जबकि जुलाई में अच्छी बारिश हुई। इसके बाद अगस्त में वर्षा के आंकड़े में फिर गिरावट आई। सितंबर में भी पिछले वर्ष की तुलना में बारिश कम दर्ज की गई।
जून से सितंबर तक 2026 में 962.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि वर्ष 2025 में इसी अवधि में 1336.7 मिलीमीटर बारिश हुई थी। इस तरह इस मानसून अवधि में पिछले वर्ष की तुलना में 374.6 मिलीमीटर कम वर्षा हुई।
जुलाई में ज्यादा, अगस्त में काफी कम हुई बारिश
| माह | 2025 | 2026 | अंतर |
|---|---|---|---|
| जून | 181.2 मिमी | 124 मिमी | 57.2 मिमी कम |
| जुलाई | 245.9 मिमी | 380.3 मिमी | 134.4 मिमी अधिक |
| अगस्त | 571.6 मिमी | 255.9 मिमी | 315.7 मिमी कम |
| सितंबर | 338 मिमी | 322.1 मिमी | 16 मिमी कम |
| कुल | 1336.7 मिमी | 962.1 मिमी | 374.6 मिमी कम |
पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के मौसम वैज्ञानिक डॉ. अजीत नैन के अनुसार इस वर्ष बारिश पूरी तरह कम नहीं रही, बल्कि उसका वितरण असमान रहा। उनके अनुसार अलनीनो फैक्टर भी बारिश के असमान वितरण की एक वजह रहा। पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में बदलाव का प्रभाव मानसूनी गतिविधियों पर पड़ सकता है।
असमान बारिश से बढ़ सकती हैं जल और आपदा प्रबंधन की चुनौतियां
आंकड़े बताते हैं कि जुलाई में इस वर्ष पिछले साल से 134.4 मिलीमीटर अधिक बारिश हुई, लेकिन अगस्त में 315.7 मिलीमीटर कम वर्षा ने पूरे मानसून के आंकड़े को प्रभावित किया। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में बारिश के इसी तरह असमान वितरण से पर्वतीय क्षेत्रों में जल प्रबंधन और आपदा प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।