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मधुमक्खियों के दुश्मन ततैयों पर बिजली का पहरा, पंतनगर वैज्ञानिकों ने बनाया ‘वैस्प गार्ड’
मधुमक्खियों के लिए जुलाई से अक्टूबर तक का समय बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस दौरान ततैया यानी बर्र के हमलों से मधुमक्खियों की कालोनियों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। मौन पालकों की इसी समस्या का समाधान खोजते हुए जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर के मधुमक्खी अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने ‘वैस्प गार्ड’ नामक एक यंत्र विकसित किया है। करीब 150 से 200 रुपये की लागत वाली यह तकनीक मधुमक्खियों को ततैयों के हमले से बचाने के लिए विकसित की गई है। विश्वविद्यालय ने इस नवाचार का पेटेंट भी फाइल कर दिया है।
मधुमक्खियों की सुरक्षा के लिए किफायती तकनीक
मधुमक्खियां केवल शहद और मोम उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि फसलों के परागण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में मधुमक्खियों की संख्या और स्वास्थ्य पर असर पड़ने से कृषि उत्पादन के साथ पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए पंतनगर विश्वविद्यालय के मधुमक्खी अनुसंधान केंद्र में मौन पालकों की समस्याओं के व्यावहारिक और किफायती समाधान तलाशे जा रहे हैं।
ततैया मधुमक्खियों की कॉलोनी को पहुंचा सकता है नुकसान
कीट विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पीके मल्ल के अनुसार, ततैया मौन पालन में मधुमक्खियों के प्रमुख शत्रुओं में शामिल है। उन्होंने बताया कि प्रमुख रूप से पाई जाने वाली ततैया वैस्पा मैग्नेफिका मधुमक्खी के बॉक्स के प्रवेश द्वार के आसपास मंडराती रहती है और बाहर निकलने वाली मधुमक्खियों को पकड़ लेती है।
ततैया मधुमक्खी के वक्षीय हिस्से को चबाकर स्वयं खाती है और अपने बच्चों के भोजन के रूप में भी इसका इस्तेमाल करती है। डॉ. मल्ल के मुताबिक, एक मधुमक्खी बॉक्स के आसपास मौजूद तीन-चार ततैये भी पूरी कॉलोनी को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। ततैयों के व्यवहार और उनकी सतर्कता के कारण उन्हें नियंत्रित करना मौन पालकों के लिए आसान नहीं होता।
वैज्ञानिकों ने ततैयों के व्यवहार का किया अध्ययन
ततैयों के बढ़ते हमलों को देखते हुए डॉ. पीके मल्ल ने इस समस्या पर अध्ययन शुरू किया। वैज्ञानिकों ने ततैयों के व्यवहार, उनके हमले के तरीके और मधुमक्खियों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया। इसके बाद शोध में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. वीके सिंह, डॉ. जलज शर्मा और उनकी टीम को भी शामिल किया गया।
कई प्रयोगों और अलग-अलग डिजाइनों पर काम करने के बाद ‘वैस्प गार्ड’ तैयार किया गया। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि मधुमक्खियों की आवाजाही बाधित न हो और ततैयों को मधुमक्खी बॉक्स के प्रवेश द्वार तक पहुंचने से रोका जा सके।
कैसे काम करता है ‘वैस्प गार्ड’?
वैस्प गार्ड में लकड़ी के फ्रेम के भीतर करीब एक इंच की दूरी पर महीन तारों का जाल तैयार किया गया है। इन तारों में एक विशेष सर्किट के माध्यम से नियंत्रित वोल्टेज का करंट प्रवाहित किया जाता है।
मधुमक्खियां तारों के बीच से आसानी से निकल जाती हैं, जबकि ततैया जब दो तारों के संपर्क में आती है तो उसे विद्युत झटका लगता है। इससे वह वहीं निष्क्रिय हो सकती है या फिर दूर चली जाती है। इस यंत्र को मधुमक्खी के बॉक्स के मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाया जाता है।
बिजली के झटके के बाद ततैयों में बचाव व्यवहार
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तकनीक की एक खासियत यह भी है कि ततैया को एक बार विद्युत झटका लगने के बाद वह दोबारा उस स्थान के आसपास आने से बचती है। यानी कुछ समय बाद तारों में करंट न होने पर भी ततैयों में उस स्थान को लेकर एक तरह का बचाव व्यवहार विकसित हो सकता है।
पेटेंट के बाद व्यावसायिक उत्पादन की तैयारी
विश्वविद्यालय ने इस नवाचार का पेटेंट फाइल कर दिया है। अब पेटेंट प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी औद्योगिक संस्थान के साथ अनुबंध कर ‘वैस्प गार्ड’ का व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने की तैयारी है।
यदि इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होता है तो कम लागत में उपलब्ध यह उपकरण छोटे और बड़े दोनों स्तर के मौन पालकों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इससे मधुमक्खियों को ततैयों के हमलों से बचाने और मौन पालन को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
मौन पालन को सुरक्षित बनाने की दिशा में कदम
वैज्ञानिकों का मानना है कि मधुमक्खियों को ततैयों से बचाने के साथ यह तकनीक मौन पालन को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। कम लागत और व्यावहारिक उपयोग को ध्यान में रखते हुए वैस्प गार्ड का व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने के बाद इसके व्यापक स्तर पर इस्तेमाल की संभावना बन सकती है।

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